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यादों के झरोखे- अतीत को खंगालता लीडराबाद

अपना शहर मगरुवा
अतीत को खगालता – लीडराबाद 
माले मुफ्त दिले बेरहम – बड़े गजब के लोग बैठते थे लीडराबाद में 
अब यहाँ बैठते है कच्चे खिलाड़ी जिनका सिर्फ धंधा दलाली है ।
लीडराबाद के शिरोमणि —
 स्व तहसीलदार पाण्डेय स्व कृष्ण पाल सिंह स्व कपिलदेव सिंह स्व राकेश उपाध्याय और अब है कैलाश पाण्डेय ………. 
आजमगढ़ का वैभव बड़ा ही अच्छा रहा है और यह धरती ऋषि मुनियों की तप स्थली के साथ ही सामाजिक और राजनितिक इतिहास से भी प्रबल है | इसी कड़ी में आज आपको ले चलते है कलेक्ट्री कचहरी के पास सिविल लाइन पुलिस चौकी के पीछे श्रीराम काफी हाउस ( लीडराबाद ) इसको स्थापित करवाया कुम्भन दास जी ने कुम्भन दास जी गिरधर दास अग्रवाल के बेटे थे और मऊ के रहने वाले थे | उन्ही के द्वारा  यह जगह 1953 में श्रीराम हलवाई को होटल खोलने के लिए दिया गया | श्रीराम हलुवाई ने अपने मेहनत और ईमानदारी से लोगो के दिल में जगह बनाई |  जब मैं काफी हाउस आज का लीडराबाद पहुचा तो देखा रोज की तरह मगरुवा बैठा है मैंने उससे हालचाल पूछा उसने जबाब दिया सब ठीक है तब मैंने बड़े प्यार से कहा कि भाई मगरू जी कुछ इसके बारे में बताये मगरू अतीत की यादो में खो गया ——- और उसकी वाणी से निकल पडा काफी हाउस से बना लीडराबाद  का संस्मरण — सन 53 के बाद से ही यह काफी हॉउस प्रदेश और देश की राजनीत का चर्चा का केंद्र बन गया | इस  जगह पर आजमगढ़ के बड़े दिग्गज राजनेता अपना अखाड़ा जमाते सुबह 9 बजे के बाद से ही यहाँ पर अपना अखाड़ा जमाते थे और यह बहस शाम ढलने तक चलती थी | जिले में जितने बड़े नेता हुए वह  अपनी जवानी के दिनों में यही से राजनीत करते थे इस जगह पर  वामपंथी धारा  के कामरेड जय बहादुर सिंह , कामरेड तेज बहादुर सिंह , कामरेड झारखडे राय  कामरेड चन्द्रजीत यादव जो बाद में कांग्रेसी हो गये ,  बाबू त्रिवेणी राय व् तमाम कम्युनिस्ट नेता बैठते थे ,वही पर  युवा तुर्क के अजीज साथी आदरणीय रामधन जी ,कांग्रेसी नेता पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व कल्पनाथ राय ,  पूर्व सांसद स्व राजकुमार राय ,  शिक्षक विधायक स्व पंचानन राय , पूर्व मंत्री शम्भु सिंह , स्व छागुर राम , पूर्व मंत्री स्व रामप्यारे सिंह ,  स्व बाबू बृज भूषण लाल श्रीवास्तव , स्व  त्रिपुरारी पूजन प्रताप सिंह उर्फ़ बच्चा बाबू पूर्व ब्लाक प्रमुख गोरख़ सिंह  , बाबू राम कुवर सिंह संन  1948 से ही ठीकेदारी करने वाले स्व लालता सिंह , मझगावा के  स्व रज्जू सिंह हीरापट्टी के बाबू स्व अक्षयबर सिंह और कोयलसा के  स्व बाबु भृगुराज  सिंह  सहकारिता आन्दोलन के सजग प्रहरी बाबु रामकुवर सिंह जैसे जिले के मानिद लोगो की यहाँ पर राजनीत की महफिल सजती थी | अलग – अलग टेबल पर अलग धाराओं की जबर्दस्त चर्चा होती थी कभी – कभी यह चर्चा इतना उग्र रूप धारण करती थी लगता था कि अब नही तब झगड़ा हो जाएगा | यह भी कहा जा सकता है श्रीराम काफी हाउस राजनितिक अडी के लिए जाना जाता था और आज भी है | इन नेताओं की पसंदीदा डिश ” कलेजी – कबाब – मखन्न ब्रेड और ख़ास नीबू की काली चाय तब का जमाना सस्ती का था उस समय वह पर 40 पैसे में गरम् छोला , आठ आने में गुलाब जामुन पेडा , शाही टुकडा , मीठी बुनिया 40 पैसे में दहीबड़ा इसके साथ ही उस समय पाँच रूपये प्लेट कलेजी — मटन और पचास पैसे में कबाब मिला करता था इन सबके शौक़ीन यहाँ बैठने वाले सारे लोग थे |  मगरू ने कहा  एक बार तहसीलदार  पाण्डेय अपने साथियों के साथ यहाँ बैठे थे एक अखबार लेकर परम मित्र सुनील राय जी वहाँ पहुच कर पाण्डेय जी को कैलाश पाण्डेय समझकर उनसे  कहा क्या पाण्डेय जी मेरे खिलाफ आपने समाचार दिया है तब तहसीलदार पाण्डेय  ने कहा ऐसी कोई बात नही तभी सुनील राय जी उनको अखबार दिखाने  लगे पूरा समाचार पढने के बाद उन्होंने कहा राय साहब मैं कैलाश पाण्डेय नही हूँ यह समाचार तो कैलाश पाण्डेय ने दिया है |  तभीवहाँ  पर बैठे एक नेता ने कहा कि यह क्या नेतागिरी करेंगे जब आदमी पहचान नही सकते ?
यहाँ पर बैठने वाले दो नेता शशी राय और यादवेन्द्र  ऐसे नेता है जिन्होंने सारा जीवन खाने की राजनीत की एक संस्मरण इनका — संसद का सेन्ट्रल हाल  लंच के समय खचाखच भरा हुआ था और यह दो फक्कड और घुमक्कड़ अवैध रूप से घुसकर वहाँ  सूप पी रहे थे , थोड़ी देर बाद पूर्व सांसद डा संतोष सिंह भी वहाँ लंच करने के इरादे से गये थे | वहाँ पर एक भी कुर्सी  खाली नही थी , उन्होंने चारो तरफ नजर दौड़ाई तो देखा आजमगढ़ के दो फटीचर नेता शशी प्रकाश राय और यादवेन्द्र सिंह बैठकर सूप पी रहे है उन्होंने वेटर से पूछा यहाँ अनाधिकृत लोग कैसे बैठे हुए है , तो वेटर ने जबाब दिया सभी माननीय सांसद  सदस्य जी है , तब डा सन्तोष सिंह जी ने शशी प्रकाश राय और यादवेन्द्र सिंह की तरफ इशारा करके कहा कि यह आजमगढ़ के दो फटीचर सांसद है  क्या ? यह दोनों डर के मारे सूप छोडकर भगे कि कही प्राथमिकी दर्ज न हो जाए और संसद के बाहर आकर चिल्ला चिल्ला  कर कहने लगे सांसद होने का मतलब यह नही की कार्यकर्ताओं को सूप भी न पीने दे | इन दोनों महानुभावो ने पूरा जीवन किसी व्यक्ति की समीक्षा में इस बात पर तौला की उसने इन दोनों को कितना खिलाया | जिले के एक ऐसे  काग्रेसी नेता बीरभद्र प्रताप सिंह जी भी अनोखे थे इनकी एक घटना बकौल यादवेन्द्र सिंह वो अक्सर चर्चा करते थे भारतवर्ष के किसी पूर्व सांसद के रूप में संसद की सुविधाओं का माले – मुफ्त – दिले बेरहम को जैसा चरितार्थ किया उसकी आजाद भारत में दूसरा कोई मिशाल नही है | समूचे संसद सत्र के दौरान वह सोमवार से शुक्रवार तक यूपी भवन में मुफ्त में रुकते  और संसद भवन के कैंटीन में मुफ्त का भोजन करते  | दार्शनिको की तरह यादवेन्द्र सिंह बोलते है कि शुक्रवार को कैंटीन से चावल ब्रेड मखन्न , अंडे इत्यादि जो की संसद की कैंटीन में न्यूनतम दामो में प्राप्त होता था , उसको ले आकर सूटकेस  में भरते थे और वो भरी सूटकेस  को ढोने के लिए मुझे या शशी प्रकाश राय को दिल्ली ले जाते थे , एक बार सूटकेस  ज्यादा भारी  होने पर मैंने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उनके  सूटकेस  को पटक दिया और सूटकेस खुल गया  मैंने देखा की इसमें चावल ब्रेड अंडे इत्यादि बिखरे है | इन्होने रेलवे पुलिस को गुहार लगाई मुझे पकड़ने के लिए और मैं पतली गली से सरक लिया | वैसे बीरभद्र जी के बहस का मुख्य विषय छिनारपंन  होता था , और खूटी पर  टंगी साडी दिख जाए तो वे उधर दौड़ लगा देते थे |  इसी चर्चा में एक और अनोखी चर्चा एक बार  भाजपा नेता श्याम नरायन सिंह के साथ बाबू शिवनाथ सिंह लखनऊ की  रेल यात्रा कर रहे थे |, शिवनाथ भाई को यह मालूम नही था कि   नेता श्याम नरायन सिंह कभी टिकट लेकर नही चलते उस यात्रा में बाराबंकी – बादशाह नगर के बीच  में रेलवे के विजिलेंस जाँच के दौरान श्याम नरायन  सिंह बाथरूम में घुस गये विजलेंस के अधिकारी ने उनको  बाथरूम से निकला व उनसे  टिकट माँगा टिकट ना होने पर उसने इन्हें दो तमाचा  मारा और सौ बार कान पकडकर उठक —  बैठक करवाया हर्जाना भरने के बाद यह बीजेपी  कार्यालय गये और वहाँ  पर बोकरादी पेल रहे थे कि मैं तो शिवनाथ सिंह के चक्कर में फंस गया उन्हें नही मालुम था कि शिवनाथ सिंह उनके पीछे खड़े है उन्होंने श्याम नरायण सिंह के कंधे पर थपकी मरकर कहा की  श्याम नरायण तुमने टिकट ही कब लिया था तुम तो बिना टिकट यात्रा करने में माहिर हो | श्रीराम काफी हॉउस के तीन शिरोमणि थे ,  बैठोली के कपिलदेव सिंह , तहसीलदार पाण्डेय और कांग्रेसी नेता कपिलदेव सिंह बकौल कांग्रेसी मगरू ने चर्चा करते हुए कहा कि शिक्षक नेता मुन्नू यादव जी  बहुत बार चर्चा करते है हीरापट्टी के नाते सुरेन्द्र सिंह के साथ वो तालकटोरा के राष्ट्रीय अधिवेशन में में पुराने अधिवेशन का पास लेकर घुस गये सुरक्षा गर्दो ने कोई ध्यान नही दिया अन्दर घुस कर उन्होंने गर्दो से कहा की मैं पूर्व मंत्री हूँ और वही अन्दर से ही उन्होंने नाते सुरेन्द्र सिंह को बुलाया और कहा ये भी मेरे साथ है | अधिवेशन के बाद बकौल मुन्नू यादव् ने बोला उस अधिवेशन में सोनिया जी रात्र का भोजन अपने यहाँ दस जनपथ में आयोजित किया था उक्पिल्देव सिंह ने मुन्नू यादव से बोला चलो मेरे साथ तुम सोनिया जी के यहाँ रत्रिभोजन में मुन्नू ने कहा की वहाँ अन्दर कैसे जायेंगे उन्होंने कहा चलो अंदर चले जायेंगे वहाना पहुचकर वो कुछ देर इन्तजार किये तभी वह पर केन्द्रीय मंत्री राजेश  पायलेट आ गये वो तुरंत आगे बढ़े उन्होंने पायलेट जी से बोला आपने कृषि नीति पर जबर्दस्त बोला है इसकी चर्चा पुरे देश में हो रही है और उनका हाथ पकडकर अन्दर चले गये अंदर पहुच कर मुन्नू से बोले मुन्नू देशी घी से बोला रोटी मत खाना बस देशी घी से तला देशी मुर्गा और तली मछली खाना ऐसे वीर थे कपिलदेव सिंह  में एक बात और थी वो जब भी किसी की पैरवी करते तो वो हमेशा अपनी गाडी में दस लीटर पेट्रोल भरवाते उससे जिसकी पैरवी करने जाना होता था और उसी से पाँचगिलास मोसम्मी का जूस भी पीते —  इस लीडराबाद के शिरोमणियो में कृष्ण पाल सिंह और राकेश उपाध्याय यह दोनों ही अदभुत प्राणियों में से एक थे राकेश उपाध्याय की बात करते हुए मगरू ने कहा एक बार शिबली कालेज के अध्यक्ष बीरेंद्र सिंह बुलडाग के यहाँ एक समारोह में राकेश नेता गये रात्रि विश्राम के बाद सुबह तडके ही मनौती के लिए एक बकरा बंधा था उनके दरवाजे पर राकेश ने उसकी रस्सी खोल ली और  फुर्र हो गये | करतारपुर से लेकर पहाडपुर तक आ गये अचानक बुलडाग की नीद खुली उन्होंने देखा खूटी से बकरा गायब है वो तुरंत समझ गये की यह काम राकेश उपाध्याय का है वो तुरंत अपनी मोटर साइकिल से उनको खोजते हुए पहाडपुर तक आये उन्होंने देखा की राकेश उपाध्याय के हाथो में बकरे की रस्सी है उन्होंने उस रस्सी को प्राप्त करने के लिए राकेश को सौ रूपये दिए तब उन्हें बकरे की रस्सी मिली | 1985 में  डा सांसद संतोष सिंह  जब उनका जलवा था उनके आवास पर राकेश उपाध्याय गये उसी समय डा सन्तोष सिंह अपनी रिवाल्वर निकल क्र बिस्तर पर रखकर बाथरूम गये उसी दरमियाँ राकेश उपाध्याय उनका रिवाल्वर लेकर वहा से फुर्र हो गये जब डा सन्तोष सिंह बाथरूम से वापस ए उन्होंने देखा उनका रिवाल्वर गायब है उनके होश उड़ गये वो तुरंत अपनी गाडी से राकेश उपाध्याय को खोजते हुए रैदोपुर औए अपने परिचितों  से उन्होंने पूछा की राकेश नेता को देखा है तब वही पर खड़े सामजवादी विचारक संजय श्रीवास्तव ने कहा चले जाइए पुराने पुल के पास आपको राकेश नेता गाँजा पीते हुए मिल जायेगे डा संतोष सिंह हाफ्ते पुराने पुल स्थित मंदिर पर पहुचे तो वह पर राकेश उपाध्याय मौजूद थे उन्होंने बिना किसी डर भय के डा सन्तोष सिंह से अपनी चिर परचित तोतली आवाज में कहा का हो जान गईला रिवाल्वर गायब हो गईल तो डा सन्तोष सिंह ने कातर भाव से कहा मुझे डर था कि वह रिवाल्वर तुम पैसा लेकर किसी को बेच ना दो और वह अपराधी कृत कर मुझे फँसा न दे | तब राकेश ने कहा पहिले पाँच सौ रुपया डा तब तोहर रिवाल्वर मिली उनके पांच सौ रुपया देने के पश्चात उन्होंने खुरपी उठाई और जमीन खोदने लगे लगभग एक फीट जमीन खोदने के बाद रिवाल्वर दिखाई दिया तब उन्होंने डा सन्तोष सिंह ने रहत की सांस लिया ऐसे विलक्ष्ण थे राकेश उपाध्याय एक खास बात वरिष्ठ पत्रकार सिर्फ लीडराबाद राकेश उपाध्याय और रोहित यादव को पैसा देने के लिए यहाँ आते थे | एक बार विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेता हुकुमदेव नारायण यादव लीडराबाद में भाषण करने आये उनके भाषण में संस्कृत का पुट था जिससे वरिष्ठ पत्रकार बनवारी लाल जालान जी अत्यधिक प्रभावित हुए और उन्होंने राकेश उपाध्याय के दुसरे जोड़ीदार वरिष्ठ नेता कृष्ण पाल सिंह ( के पी सिंह ) से श्री यादव के भाषण की तारीफ की तो बेलौस ढंग से के पी सिंह ने जबाब दिया की जब अहीर संस्कृति बोले लगे औरत पिंगला बांचे लगे तब समझ लिहा घोर कलयुग अ गएल हवे इस पर वहां उपस्थित लीडरबाद ठहाको से गूंज उठा |
  वक्त बदला पर श्रीराम काफी हाउस  ( लीडराबाद ) का   क्रेज जस का तस बना रहा | बदलते जमाने की रफ़्तार के साथ ही  इसका नया  नामकरण हुआ |  वरिष्ठ पत्रकार बनवारी जालान ने एक नाम दिया  लीडराबादउसके बाद यहाँ पर राजनीति की अडी  जमाने  खाटी समाजवादी चिन्तक व नेता बड़े भाई विनोद कुमार श्रीवास्तव प्रखर समाजवादी व वरिष्ठ पत्रकार बड़े भाई विजय नरायन ,  असलाई के किसान नेता स्व श्याम बहादुर सिंह कामरेड अतुल अनजान , पूर्व सांसद डा संतोष सिंह , चुन्न राय पूर्व विधायक समई राम पूर्व मंत्री फागु चौहान , पूर्व मंत्री सुखदेव राजभर , विधायक आलमबदी, पूर्व कांग्रेसी नेता बाबु लालसा राय , कामरेड अरुण सिंह एडवोकेट , पूर्व मंत्री बलराम यादव ,  कांग्रेसी नेता हवलदार सिंह , साथी कांग्रेसी नेता तेज बहादुर यादव काग्रेसी नेता ज्ञान राम , काग्रेसी नेता सूरज राय , काग्रेसी नेता कृष्ण कान्त, पाण्डेय हीरापट्टी के बाबु सुरेन्द्र सिंह नाटे, सुरेन्द्र सिंह लंबू , कवलधारी राम ,  जुलेफेकार बेग , इम्तेयाज बेग ज्ञान प्रकाश दुबे  समाजवादी नेता तहसीलदार पाण्डेय , कैलाश पाण्डेय जैसे लोगो का जमावड़ा होता रहा | इस जगह पहले जो राजनितिक बहसे हुआ करती थी एक साफ़ सुधरा माहौल में पक्ष – विपक्ष की राजनीत करने वाले एक दुसरे का सम्मान और ख्याल रखते थे , पहले आम आदमी के कष्टों पर यही से आन्दोलन खड़े होते थे वो परम्परा अब यहाँ  से समाप्त हो गयी अब नई परम्पराओं ने जन्म ले लिया है पहले जो   राजनीति बहस हुआ करती थी इन लोगो के समय में अब उसमे बदलाव आ गया उसकी कड़ी में मंत्री दारा चौहान , डा बलिराम , , बलिहारी बाबु डा राम दुलारे , हीरालाल गौतम , पूर्व विधायक विद्या चौधरी , आफताब आलम कुरैशी , तेज बहादुर यादव हवलदार सिंह पूर्व अध्यक्ष जिला पंचायत हवलदार यादव यहाँ के आकर्षण से यहाँ का व्यापार करने वाला तबका भी  सन्तु अग्रवाल गोकुल दास  अग्रवाल मिठ्ठू अग्रवाल राजेन्द्र अग्रवाल उर्फ़ राजे बाबू यहाँ तक की दिलीप अग्रवाल इस जगह पर आके लुफ्त उठाते रहते है |  यह काफी हाउस यहाँ के अधिवक्ताओं का भी आकर्षण  केंद्र बना रहा कभी यहाँ पर वरिष्ठ अधिवक्ता स्व कमलाकर सिंह , स्व जगदीश सिंह लालता सिंह  वरिष्ठ अधिवक्ता और कांग्रसी नेता स्व कपिलदेव सिंह  अधिवक्ता अनिल गौड़ , अधिवक्ता शिवकरन, अधिवक्ता शत्रुघन सिंह , अधिवक्ता इन्द्रासन सिंह अधिवक्ता और पत्रकार महेंद्र सिंह जैसे लोगो की यहाँ पर बैठकी लगती थी | अब तो समय की रफ़्तार ने यह की हर चीज को बदल दिया है | अब तो यह काफी हाउस स्लाटर हाउस में बदल गया है इस पीढ़ी के को तथाकथित नेता अपने को कहते है गांव गिराव से काम कराने के बहाने ले आते है और उनको हलाल करते है , अब यहां कोई राजनीतिक  बहस नहीं होती कोई  जिले की समस्या पर चर्चा नहीं होती ना ही अब राजनीतिक दलों के नेताओं में आपसी तालमेल नहीं दिखता इस कारपोरेट संस्कृति ने यहां की तासीर जी ख़तम कर दिया ।
सुनील दत्ता स्वतंत्र पत्रकार दस्तावेजी छायाकार

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